बुधवाना अस्पताल में बुखार और सिरदर्द तक की दवा नहीं

0

JNI NEWS : 07-02-2014 | By : Jagendra | In : shahjahanpur news

— पीएचसी मात्र एक वार्ड ब्याय के सहारे
— सीएमओ ने इंडेंट पर दवाएं नहीं भेजीं
— पानी की टंकी तो है लेकिन मोटर नहीं
bbbb copy

शाहजहांपुर। फिल्म शोले देखी है, जिसमें धर्मेंद्र पानी की टंकी पर चढ़ जाता है। यह उस गांव की पानी की टंकी होती है, जहां बिजली नहीं होती और जयाभादुड़ी को लालटेन जलाते दिखाया जाता है। ऐसा ही हाल बुधवाना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का है। यहां पानी की टंकी तो रखी है, लेकिन मोटर नहीं लगाया गया। और तो और पीएचसी पर सरकारी हैंडपंप तक नहीं है। इन बातों को छोडि़ए! अस्पताल का तात्पर्य इलाज और दवा से होता है। लेकिन यहां तो कोई डाक्टर ही नहीं है। एक वार्ड ब्याय है। लेकिन वह भी क्या करे अस्पताल में तो बुखार और सिरदर्द तक की टिकिया तक नहीं बची है।
सरकार ने गांव-कस्बों में करोड़ों रुपया खर्च करके अस्पताल तो बनवा दिए, लेकिन डाक्टरों व अन्य स्टाफ का बंदोवस्त नहीं कर पाई। अस्पतालों में न तो डाक्टर हैं और न दवाएं, ऐसे में अस्पताल से आम जनता को क्या लाभ। हाथी के दांत जैसे इन अस्पतालों में अब तो मरीजों ने भी आना छोड़ दिया है। बुधवाना का ही अस्पताल ले लीजिए। सरकार ने लाखों रुपया खर्च करके हाल ही में अस्पताल बनवाया। लेकिन पिछले तीन महीने से अस्पताल का जनस्वास्थ्य से कोई मतलब नहीं रह गया है। यहां तैनात एकमात्र चिकित्सक डा.करन सिंह को जलालाबाद सीएचसी पर सुपरेंटेंडेंट बनाकर भेज दिया गया। तब से इस अस्पताल में सिर्फ एक वार्ड ब्याय रामनिवास बचा है। वैसे तो अस्पताल में एक लैब टैक्नीशियन और एक चैकीदार भी है। चैकीदार जगदीश का काम सुबह अस्पताल का ताला खोल देना और फिर सारा दिन उसकी रखवाली करना है। जबकि लैब टैक्नीशियन मो.शरीफ अंसारी के लिए यहां कोई काम है ही नहीं। अस्पताल परिसर में ही रह रहे वार्ड ब्याय रामनिवास ने बताया कि डाक्टर के जाने के बाद अब तो यहां कोई आता भी नहीं। मरीज आकर भी क्या करें। यहां तो बुखार और सिरदर्द तक की दवा नहीं है। इंडेंट भेजा गया था, लेकिन दवाएं नहीं आईं। मरीज आते हैं लेकिन निराश होकर जलालाबाद सीएचसी चले जाते हैं जो यहां से सोलह किमी दूर है। गर्भवती महिलाओं को इतनी दूर प्रसव के लिए ले जाने में खासी दिक्कत होती है।
अस्पताल परिसर में सरकारी हैंडपंप तक नहीं है। अस्पताल बनते वक्त ठेकेदार ने एक नल लगाया था, उसी से काम चल रहा है। काफी बड़ी पानी की टंकी भी है, जो सफेद हाथी है। टंकी के लिए मोटर तो लगाया ही नहीं गया। और तो और यहां बिजली के कनेक्शन ट्रांसफर्मर के लिए डेढ़ लाख रुपया बिजली विभाग में जमा बताया जाता है। लेकिन आज तक ट्रांसफार्मर नहीं रखा गया। बाहर एक खंभे से केबिल जोड़कर अस्पताल की बत्ती जलाई जा रही है। कभी डीएम साहब और सीएमओ साहब इस अस्पताल का फेरा लगा जाते तो शायद इस पिछड़े क्षेत्र की बड़ी आवादी को स्वास्थ्य सेवाएं मिल जातीं।

इस लेख/समाचार पर अपनी प्रतिक्रिया लिखें-